

सीने में नासूर की तरह दर्ज है 1983 का चांपा जनआंदोलन
जनता के मूलभूत हक की लड़ाई का हुआ दर्दनाक अंत, गोलीकांड में छात्र राजकरण दुग्गड़ की हुई थी मौत
चांपा। चांपा नगर के इतिहास में 23-24 सितंबर 1983 की घटना आज भी एक ऐसी पीड़ा के रूप में याद की जाती है, जिसने जनआंदोलन को गोलीकांड में बदल दिया। नगर के वरिष्ठ प्रेस प्रतिनिधि अनंत थवाईत ने इस घटना को याद करते हुए बताया कि करीब 43 वर्ष पूर्व घटित यह घटना आज भी लोगों के जेहन में पुराने नासूर की तरह दर्ज है।
बताया जाता है कि उस समय नगरवासी पानी, बिजली और सफाई जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर लंबे समय से शासन-प्रशासन से मांग और निवेदन कर रहे थे। आरोप था कि लगातार शिकायतों और मांगों के बावजूद स्थानीय प्रशासन की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। इससे छात्रों और युवाओं में आक्रोश बढ़ता गया और 23 सितंबर 1983 को नगर में जनआंदोलन का स्वरूप सामने आया।
आंदोलन के दौरान तत्कालीन मुख्य नगरपालिका अधिकारी राजीव लोचन पाण्डेय, पीवी पार्थन एवं प्रशासक एस.ए. अली को लेकर प्रदर्शनकारियों द्वारा विरोध का उग्र तरीका अपनाए जाने की बात सामने आती है। प्राप्त जानकारी के अनुसार अधिकारियों को उनके घरों से बाहर लाकर चप्पल-जूतों की माला पहनाई गई तथा चेहरे पर कालिख पोती गई।
इसके बाद अधिकारियों की ओर से आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले रामचरण सोनी, रमाकांत सोनी, सुनील सेठी, इब्राहिम मेमन, अनुपम श्रीवास्तव, मुकेश कुमार, शशि शुक्ला, गणेश यादव, शशिकांत पाण्डेय, रामेश्वर गुप्ता, कन्हैया विरानी एवं विष्णु मोदी सहित अन्य के खिलाफ थाने में नामजद रिपोर्ट दर्ज कराए जाने की जानकारी मिलती है।
गिरफ्तारी के विरोध में थाने का घेराव:
24 सितंबर को कुछ युवाओं और छात्रों की गिरफ्तारी की खबर फैलते ही नगर में आक्रोश फैल गया। बताया जाता है कि स्कूल-कॉलेज बंद कराए गए और बड़ी संख्या में नागरिकों ने थाने का घेराव करते हुए गिरफ्तार युवाओं की रिहाई की मांग की।
इसी दौरान स्थिति तनावपूर्ण हो गई। उपलब्ध विवरण के अनुसार पुलिस द्वारा पहले आंसू गैस के गोले छोड़े गए, जिससे मौके पर भगदड़ की स्थिति बनी। इसके बाद पुलिस द्वारा लाठीचार्ज और गोली चलाए जाने की बात कही जाती है।
गोलीकांड में छात्र राजकरण दुग्गड़ की मौके पर ही मौत हो गई। इस घटना ने पूरे चांपा नगर को झकझोर दिया। प्रदर्शन में शामिल कई लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए जाने की जानकारी भी सामने आती है, जिसके चलते संबंधित लोगों को लंबे समय तक न्यायालय के चक्कर लगाने पड़े।
वर्षों तक मनाया गया काला दिवस:
बताया जाता है कि न्यायालय में प्रकरण चलने के दौरान नगर में प्रत्येक वर्ष 24 सितंबर को इस घटना की स्मृति में काला दिवस मनाया जाता रहा। समय बीतने के बावजूद 1983 की घटना की स्मृति लोगों के बीच बनी रही।
नगरवासियों द्वारा राजकरण दुग्गड़ को भावनात्मक रूप से आंदोलन में प्राण गंवाने वाले शहीद के रूप में याद किया जाता है। उनकी स्मृति में प्रतिमा स्थापित किए जाने तथा प्रत्येक वर्ष 24 सितंबर को श्रद्धांजलि सभा आयोजित किए जाने की परंपरा भी जारी रहने की बात कही जाती है।
आज, 43 वर्ष बाद भी 23-24 सितंबर 1983 की घटना चांपा के इतिहास में जनआंदोलन, प्रशासनिक टकराव और गोलीकांड की एक दर्दनाक स्मृति के रूप में याद की जाती है।
नोट: यह समाचार उपलब्ध जनश्रुति, वरिष्ठ प्रेस प्रतिनिधि द्वारा साझा किए गए विवरण एवं प्राप्त जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। प्रस्तुत विवरण के प्रत्येक तथ्य की स्वतंत्र दस्तावेजी पुष्टि का दावा नहीं किया जाता है।
संवाददाता — हरि देवांगन





















