

करोड़ों का बस स्टैंड या आवारा पशुओं का ठिकाना? न्यू महाराणा प्रताप बस स्टैंड की बदहाली पर उठे गंभीर सवाल
यात्रियों से ज्यादा घुमंतू पशुओं और असामाजिक तत्वों का जमावड़ा होने का आरोप; जुआ-मदिरापान की शिकायतें, बसों के निर्धारित स्टैंड तक नहीं पहुंचने पर भी सवाल
7–8 साल बाद भी व्यवस्था पटरी पर क्यों नहीं? नगरवासियों ने प्रशासन, नगर पालिका और परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल

चांपा। नगर के गौरव पथ से आगे, नगर पालिका के निकट स्थित न्यू महाराणा प्रताप बस स्टैंड की मौजूदा स्थिति ने व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। करोड़ों रुपये की लागत से यात्रियों की सुविधा और व्यवस्थित बस संचालन के उद्देश्य से तैयार किया गया यह बस स्टैंड आज अपनी बदहाली पर मानो स्वयं सवाल पूछ रहा है—आखिर यात्रियों के लिए बनाया गया बस स्टैंड वीरान क्यों है और जिम्मेदारों की नजर यहां तक क्यों नहीं पहुंच रही?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि बस स्टैंड परिसर में यात्रियों की अपेक्षा घुमंतू पशुओं और असामाजिक गतिविधियों में लिप्त लोगों का जमावड़ा अधिक दिखाई देता है। परिसर और आसपास आवारा पशुओं की मौजूदगी आम हो चुकी है। वहीं कुछ नगरवासियों का दावा है कि बस स्टैंड की सीढ़ियों और छत सहित आसपास के हिस्सों में दिन के समय समूह बनाकर जुआ खेलने तथा मदिरापान जैसी गतिविधियां भी देखने को मिलती हैं।

यदि ये शिकायतें सही हैं तो सवाल गंभीर है कि सार्वजनिक यात्री परिसर में ऐसी गतिविधियों पर नियंत्रण की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? पुलिस, नगर पालिका, परिवहन विभाग और जिला प्रशासन के स्तर पर अब तक क्या कार्रवाई की गई?
बस स्टैंड बना दिया, लेकिन बसें कहां हैं?
स्थानीय लोगों और आसपास व्यवसाय करने वालों के अनुसार सुबह से दोपहर करीब 3 बजे तक कुछ बसों का आवागमन होता है, लेकिन इसके बाद बस स्टैंड लगभग वीरान होने लगता है। आरोप है कि शाम के समय कई बार बस तो दूर, ऑटो की नियमित उपलब्धता तक नहीं रहती।
जब किसी बस स्टैंड का उद्देश्य यात्रियों को एक निर्धारित स्थान से नियमित परिवहन सुविधा उपलब्ध कराना है, तब यहां पर्याप्त संख्या में बसों का नहीं पहुंचना पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है—यदि बसें निर्धारित बस स्टैंड तक नहीं आएंगी तो यात्री यहां क्यों आएंगे? और जब यात्री नहीं आएंगे तो करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए बस स्टैंड का औचित्य क्या रह जाएगा?
रेलवे स्टेशन के पास से बस पकड़ने को मजबूर यात्री?
स्थानीय स्तर पर यह भी शिकायत सामने आ रही है कि यात्रियों को कोरबा, रायगढ़ सहित अन्य स्थानों की ओर जाने के लिए न्यू महाराणा प्रताप बस स्टैंड के बजाय चांपा रेलवे स्टेशन के आसपास जाकर बस अथवा ऑटो पकड़ना अधिक सुविधाजनक लगता है।
कुछ फल विक्रेताओं और स्थानीय लोगों का दावा है कि अनेक बसें न्यू महाराणा प्रताप बस स्टैंड तक पहुंचने के बजाय रेलवे स्टेशन के आसपास के क्षेत्र से संचालित होती हैं। उनका कहना है कि बसों के संचालन और निर्धारित मार्ग को लेकर जो व्यवस्था तय की गई थी, उसका धरातल पर कितना पालन हो रहा है, इसकी जांच आवश्यक है।
इन दावों की पुष्टि संबंधित परिवहन विभाग और बस संचालकों के रिकॉर्ड से की जानी चाहिए।
निर्धारित रूट और स्टैंड का पालन हो रहा है या नहीं?
नगरवासियों का आरोप है कि बसों को निर्धारित मार्ग एवं न्यू महाराणा प्रताप बस स्टैंड से संचालित करने की व्यवस्था होने के बावजूद कई बसें अन्य स्थानों से यात्रियों को बैठाकर आगे निकल जाती हैं।
यदि ऐसा हो रहा है तो यह जांच का विषय है कि संबंधित बसों के परमिट में निर्धारित मार्ग और ठहराव क्या हैं तथा वास्तविक संचालन उसके अनुरूप हो रहा है या नहीं।
परिवहन विभाग को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए कि कितनी यात्री बसों को न्यू महाराणा प्रताप बस स्टैंड से होकर गुजरना अथवा यहां ठहरना निर्धारित है और उनमें से प्रतिदिन वास्तव में कितनी बसें यहां पहुंच रही हैं।
7–8 वर्षों में कितनी बार हुआ भौतिक सत्यापन?
बस स्टैंड को संचालित हुए लगभग 7–8 वर्ष होने की बात कही जा रही है। ऐसे में एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि इस अवधि में जिला प्रशासन, परिवहन विभाग और नगर पालिका द्वारा कितनी बार बस स्टैंड का भौतिक निरीक्षण किया गया?
क्या कभी यह जांच की गई कि निर्धारित बसें यहां पहुंच रही हैं या नहीं? यात्रियों के लिए पर्याप्त सुविधाएं हैं या नहीं? परिसर में सुरक्षा व्यवस्था कैसी है? असामाजिक गतिविधियों की शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई? और यदि निरीक्षण हुए हैं तो उनकी रिपोर्ट में क्या पाया गया?
इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए।
करोड़ों की सार्वजनिक संपत्ति को वीरान छोड़ने का जिम्मेदार कौन?
स्थिति इसलिए और गंभीर मानी जा रही है क्योंकि बस स्टैंड किसी दूरस्थ इलाके में नहीं, बल्कि नगर पालिका और प्रशासनिक व्यवस्था के नजदीक स्थित है। इसके बावजूद यदि यहां घुमंतू पशुओं का जमावड़ा, कथित जुआ-मदिरापान और यात्रियों की कमी जैसी परिस्थितियां बनी हुई हैं तो यह केवल रखरखाव नहीं, बल्कि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की निगरानी का भी विषय है।
नगरवासियों का कहना है कि बस स्टैंड का निर्माण कर उसे चालू कर देना ही प्रशासनिक जिम्मेदारी की समाप्ति नहीं हो सकती। करोड़ों रुपये की सार्वजनिक संपत्ति का वास्तविक लाभ यात्रियों तक पहुंच रहा है या नहीं, इसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
अब प्रशासन से सीधे सवाल:
न्यू महाराणा प्रताप बस स्टैंड से प्रतिदिन कितनी बसों का संचालन निर्धारित है और वास्तव में कितनी बसें पहुंच रही हैं? बस स्टैंड छोड़कर अन्य स्थानों से संचालित होने वाली बसों की जांच कब होगी? असामाजिक गतिविधियों और कथित जुआ-मदिरापान की शिकायतों पर क्या कार्रवाई की गई? घुमंतू पशुओं को परिसर से हटाने की जिम्मेदारी किसकी है? पिछले 7–8 वर्षों में कितनी बार बस स्टैंड और बस संचालन का भौतिक सत्यापन हुआ?
यदि सब कुछ नियमानुसार चल रहा है तो बस स्टैंड वीरान क्यों दिखाई देता है? और यदि नियमों का पालन नहीं हो रहा है, तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई?
न्यू महाराणा प्रताप बस स्टैंड की तस्वीरें केवल बदहाली की कहानी नहीं कह रहीं, बल्कि व्यवस्था से जवाब मांग रही हैं। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन, परिवहन विभाग और नगर पालिका इन शिकायतों की संयुक्त जांच कर व्यवस्था सुधारते हैं या करोड़ों की लागत से बना यह सार्वजनिक परिसर इसी तरह उपेक्षा का शिकार बना रहता है।
नोट: जुआ, मदिरापान, बसों के निर्धारित मार्ग/ठहराव के उल्लंघन तथा निरीक्षण नहीं होने संबंधी बातें स्थानीय लोगों के आरोप एवं प्राप्त जानकारी पर आधारित हैं। संबंधित विभागों और बस संचालकों का पक्ष मिलने पर समाचार में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना उचित होगा।






















