
चांपा पुलिस के 25 हजारी इकरारनामे पर उठे सवाल
मामला शांत कराने के लिए हुआ गैर-नोटरियल इकरारनामा, भुगतान की व्यवस्था और जिम्मेदारी पर सवाल
चांपा। थाना क्षेत्र में कुछ दिन पूर्व सामने आए शिव सहिस प्रकरण के बाद अब चांपा थाना स्तर पर किए गए कथित 25 हजार रुपये प्रतिमाह के इकरारनामे को लेकर सवाल उठने लगे हैं। बताया जा रहा है कि स्टांप पेपर पर हुए गैर-नोटरियल इकरारनामे में शिव सहिस के परिवार को भरण-पोषण एवं शिक्षा-दीक्षा के लिए प्रत्येक माह 25 हजार रुपये दिए जाने का उल्लेख है।
इस इकरारनामे को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इस राशि का भुगतान किस मद या व्यवस्था से किया जाएगा और भविष्य में इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
नए थाना प्रभारी के सामने क्या होगी जिम्मेदारी?
बताया जा रहा है कि इकरारनामे में प्रत्येक माह 25 हजार रुपये दिए जाने की बात कही गई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि वर्तमान थाना प्रभारी के स्थानांतरण या कार्यकाल समाप्त होने के बाद जब नया थाना प्रभारी पदस्थ होगा, तो वह इस इकरारनामे का पालन किस अधिकार और किस वित्तीय व्यवस्था के तहत करेगा।

लोगों का कहना है कि यदि घटना किसी पूर्व थाना प्रभारी के कार्यकाल में हुई है, तो भविष्य में पदस्थ होने वाले अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से भुगतान की जिम्मेदारी किस आधार पर दी जा सकती है। यही बिंदु अब पूरे इकरारनामे को सवालों के घेरे में ला रहा है।
किस खाते या मद से होगा भुगतान?
पीड़ित परिवार को प्रतिमाह 25 हजार रुपये दिए जाने की व्यवस्था को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। क्या इसके लिए कोई सरकारी मद निर्धारित है? क्या पुलिस विभाग के पास ऐसी कोई स्वीकृत योजना या बजट व्यवस्था है? अथवा यह राशि किसी अन्य माध्यम से उपलब्ध कराई जाएगी? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है।
शिव सहिस प्रकरण की जांच पर भी सवाल
शिव सहिस की पुलिस अभिरक्षा में गंभीर रूप से घायल होने और बाद में उपचार के दौरान मौत होने को लेकर परिजनों एवं स्थानीय लोगों द्वारा सवाल उठाए गए हैं। मामले में पुलिसकर्मी के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की जानकारी सामने आई है, लेकिन घटना की परिस्थितियों और जिम्मेदारी को लेकर निष्पक्ष एवं विस्तृत जांच की मांग भी उठती रही है।
इसी बीच सामने आए 25 हजार रुपये प्रतिमाह के इकरारनामे ने मामले को और चर्चा में ला दिया है।
क्या थाना स्तर पर ऐसा इकरारनामा वैध है?
गैर-नोटरियल स्टांप पेपर पर हुए इस कथित समझौते को लेकर कानूनी विशेषज्ञों की राय भी महत्वपूर्ण होगी। सवाल यह है कि थाना प्रभारी को किस वैधानिक अधिकार के तहत भविष्य में पीड़ित परिवार को नियमित आर्थिक सहायता देने का दायित्व तय करने का अधिकार है।
यदि इकरारनामे में भुगतान की कोई स्पष्ट सरकारी अथवा विभागीय व्यवस्था नहीं है, तो भविष्य में इसके पालन को लेकर विवाद की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
फिलहाल 25 हजार रुपये प्रतिमाह देने के इस इकरारनामे ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पीड़ित परिवार को सहायता का आश्वासन वास्तविक और स्थायी व्यवस्था में बदलेगा या भविष्य में यह इकरारनामा ही कानूनी पेचीदगियों में उलझ जाएगा—यह आने वाला समय बताएगा।


















