
कयामत बरपाने वाला प्लांट: जब आधी रात ने उगला मौत का ज़हर— इतिहास की सबसे काली स्याही में दर्ज एक भयावह त्रासदी
जय जोहार सीजी न्यूज़
संवाददाता: हरिराम देवांगन
जांजगीर–चांपा | छत्तीसगढ़
वैसे तो भोपाल की आबोहवा सुबह से शाम तक देश के किसी भी सामान्य शहर जैसी ही रहती है। लेकिन 3 दिसंबर 1984 की वह मध्यरात्रि… जिसने इस शहर की फिज़ा को हमेशा के लिए ज़हरीला कर दिया। किसी को रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि आधी रात के बाद शहर पर ऐसी क़यामत टूट पड़ेगी, जो आने वाली पीढ़ियों तक इंसानियत को झकझोरती रहेगी।
कहते हैं, अनहोनी को टालना लगभग नामुमकिन होता है। उसी नामुमकिन ने 3 दिसंबर 1984 को एक क्रूर सच्चाई का रूप ले लिया। यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के कीटनाशक संयंत्र से मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) गैस का रिसाव हुआ—और यह रिसाव देखते-देखते दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक दुर्घटनाओं में शुमार हो गया।

रिसाव इतना व्यापक और घातक था कि प्लांट के आसपास ही नहीं, बल्कि कई किलोमीटर तक फैली हवा ज़हर बन गई। लोग गहरी नींद में थे—और नींद ही उनकी आख़िरी पनाह बन गई। कुछ ही घंटों में हवा में ऐसा ज़हर घुला कि जो भी इसकी चपेट में आया, या तो स्थायी रूप से बेसुध हो गया, या फिर गहरी चिरनिद्रा में समा गया।

उस रात हर मौत की अपनी एक कहानी थी। किसी मां की नींद अपने बच्चे की तड़पती किलकारी से टूटी होगी—पर समझने से पहले ही दोनों मौत के आगोश में चले गए होंगे। रात्रि पाली में ड्यूटी निभाने वाला चौकीदार, सुरक्षा कर्मी, सरकारी कर्मचारी—जो अंधेरे के साए में अपना कर्तव्य निभा रहे थे—कुछ ही मिनटों में सड़कों पर बिछी लाशों में बदल गए। यह कल्पना मात्र ही रोंगटे खड़े कर देने वाली है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस हादसे में मामूली से लेकर गंभीर रूप से घायल होने वालों की संख्या 5 लाख से अधिक बताई जाती है। तत्काल मौतों का आंकड़ा कुछ रिपोर्ट्स में 3000 से अधिक, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में 3787 दर्ज है। वहीं गैर-सरकारी आंकड़े बताते हैं कि यह संख्या 16,000 से भी अधिक हो सकती है—और वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं ज़्यादा होने की आशंका भी जताई जाती है।

मध्यरात्रि का समय, गहरी नींद और चेतावनी का अभाव—इन हालातों ने निर्दोष ज़िंदगियों को बचने का कोई मौका ही नहीं दिया। ज़हर ने सांसों को घेरा और देखते-देखते पूरा शहर मातम में डूब गया। यह सिर्फ़ एक दुर्घटना नहीं थी, बल्कि मानव लापरवाही, प्रशासनिक चूक और औद्योगिक असंवेदनशीलता का भयावह परिणाम था—जिसकी कीमत हज़ारों बेगुनाहों ने अपनी जान देकर चुकाई।

यह त्रासदी आज केवल इतिहास का अध्याय नहीं, बल्कि एक जीवित सवाल है—ज़िम्मेदारी किसकी थी? और क्या हमने इससे कोई सबक़ सीखा?
(इस अत्यंत मार्मिक हादसे की और कड़ियों को जोड़ते हुए—आगे की पड़ताल कल के अंक में अवश्य पढ़िए।)








