
संवाददाता हरिराम देवांगन/ठिठुरन कम होने से बच्चों में दिखा जबरदस्त उत्साह, धूमधाम से मना छेरछेरा का पारंपरिक त्योहार
बच्चों की उमंग ने कई वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ा।
जिला उप मुख्यालय चांपा।
पूरे प्रदेश में इस वर्ष छेरछेरा का पारंपरिक त्योहार बीते वर्षों की तुलना में कुछ पहले मनाया गया। कड़ाके की ठंड में कमी आने के कारण बच्चों में खासा उत्साह देखने को मिला, जिससे छेरछेरा पर्व की रौनक कई सालों के इतिहास को पीछे छोड़ती नजर आई।
छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक परंपरा से जुड़ा छेरछेरा पर्व वर्षों से धान की फसल पककर घर आने की खुशी में मनाया जाता रहा है। यह त्योहार मेहनत के फल, सामूहिक उल्लास और दान-पुण्य की भावना का प्रतीक माना जाता है। खासतौर पर ग्रामीण अंचलों में इसकी परंपरा आज भी पूरे उल्लास के साथ निभाई जाती है, हालांकि अब बड़े शहरों में भी इसकी झलक देखने को मिलती है।
इस वर्ष मौसम के अनुकूल रहने से सुबह करीब 7 बजे से ही मासूम बच्चे समूहों में घर-घर, दुकान-दुकान और गली-मोहल्लों में पहुंचकर “छेरछेरा छेरछेरा, कोठी के धान ला हेरते हेरा…” की पारंपरिक उद्बोधन के साथ त्योहार मनाते नजर आए। बच्चों के चेहरों पर दिखती खुशी और ऊर्जा यह बताने के लिए काफी थी कि ठंड कम होने से उनका उत्साह दोगुना हो गया है।
त्योहार के दौरान आम नागरिकों ने भी खुले दिल से दान-दक्षिणा दी। बच्चों की झोलियों में नगद राशि के साथ-साथ मिठाइयां, चॉकलेट, लड्डू, बिस्कुट और अनाज के रूप में धान-चावल डालते हुए लोग दिखाई दिए। मान्यता है कि छेरछेरा पर्व दान-पुण्य से जुड़ा सदियों पुराना उत्सव है, जिसमें सामर्थ्य के अनुसार देना शुभ माना जाता है।
कुल मिलाकर, इस वर्ष छेरछेरा पर्व ने न केवल पारंपरिक रंग बिखेरे, बल्कि बच्चों की बढ़-चढ़कर भागीदारी ने इसे यादगार बना दिया।








