
जय जोहार सीजी न्यूज़। छत्तीसगढ़ संवाददाता हरिराम देवांगन/ ये तेरा घर है या मेरा?
विद्युत मंडल का जबरन और जानलेवा अतिक्रमण—कानून के दायरे में या खुलेआम अन्याय?
जिला उपमुख्यालय – चांपा
चांपा विद्युत मंडल ही नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में विद्युत विभाग द्वारा किए गए जबरन अतिक्रमण के ऐसे सैकड़ों दृश्य देखने को मिल जाएंगे, जहाँ आम जनता की जान हर पल खतरे में है। समाचार में संलग्न फोटो इस बात का जीवंत प्रमाण है कि किस प्रकार जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी बिना सहमति और सूचना के निजी संपत्तियों पर विद्युत संरचनाएँ थोप रहे हैं।
यह हम नहीं कह रहे, बल्कि तस्वीर खुद गवाही दे रही है—कि किस तरह मकान मालिक को अपने ही घर के भीतर बिजली तारों, उपकरणों और खतरनाक जाल के बीच रहने को मजबूर कर दिया गया है। बताया जा रहा है कि मकान निर्माण से पहले कई बार विद्युत मंडल कार्यालय में आवेदन दिए गए, अधिकारियों के सामने गुहार लगाई गई, लेकिन नतीजा शून्य रहा। अंततः लापरवाही की कीमत मकान मालिक को अपने घर का हिस्सा गंवाकर चुकानी पड़ी।
हर तरफ जानलेवा खतरा
कहीं घर की छत के ऊपर से हाई टेंशन तार गुजर रहे हैं,
कहीं आंगन में बिजली का खंभा,
कहीं खेत-खलिहान में भारी भरकम टावर,
तो कहीं खाली जमीन में बिना अनुमति गड़े पोल—
ये सब आज आम नागरिकों के लिए दिन-रात मंडराती मौत बन चुके हैं।
ना सूचना, ना सहमति—सीधा अतिक्रमण
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब विद्युत प्रयोजनों के लिए अतिक्रमण किया जाता है, तो भू-स्वामी को न तो पूर्व सूचना दी जाती है और न ही उसकी सहमति ली जाती है। आनन-फानन में निर्माण कर दिया जाता है और संपत्ति मालिक को तथ्य के बाद में खड़ा कर दिया जाता है।
कानून किसके लिए?
क्या छत्तीसगढ़ विद्युत अधिनियम में ऐसी कोई धारा है, जो आम जनता की जान जोखिम में डालकर उनकी स्थायी संपत्ति पर जबरन कब्जे की अनुमति देती है?
अगर अतिक्रमण सार्वजनिक हित में गलत है, तो निजी संपत्ति पर यह कैसे जायज ठहराया जा सकता है?
कार्रवाई सिर्फ जनता पर, मंडल पर क्यों नहीं?
शासन-प्रशासन बरसात के पहले आम जनता के अतिक्रमण हटाने में तत्पर दिखता है, लेकिन विद्युत मंडल द्वारा वर्षों से किए गए अतिक्रमण पर आज तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यह दोहरा मापदंड लोकतांत्रिक व्यवस्था में सीधा अन्याय प्रतीत होता है।
बड़ा सवाल:
क्या राजस्व और प्रशासनिक अधिकारी कभी इस तरह की जानलेवा लापरवाहियों पर संज्ञान लेंगे?
या फिर आम नागरिक यूँ ही खतरे के साये में जीने को मजबूर रहेगा?








