
🟥 दस लाख का सवाल: 8 जनवरी के बाद SDM का अवैध धान ‘रोज़ी रेट’ कितना तय हुआ?
वाड्रफनगर में प्रशासनिक संरक्षण के आरोप, 65 बोरी धान पकड़ा गया… फिर भी कार्रवाई गायब!
रिपोर्ट: धीरेंद्र कुमार जायसवाल | स्वतंत्र पत्रकार | विशेष रिपोर्ट
स्थान: बलरामपुर/वाड्रफनगर | छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़–उत्तरप्रदेश सीमा से लगे वाड्रफनगर क्षेत्र में एक बार फिर अवैध धान परिवहन को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं।
8 जनवरी की रात ग्राम बसंतपुर (वाड्रफनगर) में यूपी से अवैध रूप से लाया जा रहा लगभग 65 बोरी धान से लदा पिकअप वाहन पकड़ा गया। मौके से वाहन चालक और उसके साथी फरार हो गए। वाहन को गश्ती टीम के जरिए बसंतपुर थाना लाने के निर्देश भी दिए गए।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि—
✅ जप्ती तो हुई, फिर कार्रवाई दिखाई क्यों नहीं दी?
🟨 जप्ती के बाद कार्रवाई “औपचारिक” और मामला “गायब”? सूत्रों के मुताबिक जप्ती के बाद नायब तहसीलदार द्वारा मौके पर फोटो खिंचवाकर कार्रवाई को औपचारिक तौर पर पूरा किया गया।
लेकिन इसके बाद सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा होता है कि—
🔴 अगर वाहन और धान अवैध था तो FIR क्यों नहीं?
🔴 राजसात/नीलामी जैसी वैधानिक प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई?
🔴 वाहन किसके कहने पर और कितनी रकम में छोड़ा गया?
यही से इस पूरे मामले ने प्रशासनिक संरक्षण और सेटिंग के आरोपों को हवा दे दी है।
🟥 SDM वाड्रफनगर की भूमिका पर उठ रहे सवाल:
स्थानीय चर्चा है कि 8 जनवरी के बाद अवैध धान कोचियों से रोजाना एक ‘रोज़ी वसूली’ सिस्टम तय कर दिया गया है।
इसी को लेकर “दस लाख का सवाल” उठ रहा है—
❓ मुख्य सवाल:
🔴SDM वाड्रफनगर ने 8 जनवरी के बाद अवैध धान कोचियों से रोज़ी में कितने पैसे लिए?
🔴समिति प्रबंधकों से कितने में ‘सेटिंग’ तय की गई?
🔴सीमा क्षेत्र में धान की आवाजाही प्रशासनिक जानकारी के बिना संभव है क्या?
🔴अगर नहीं, तो पकड़े गए मामलों का अंत ‘छूट’ में क्यों होता है?
🟦 एक्टिव टीम पर कार्रवाई… ताकि “सच” सामने ना आए?
इस मामले में बताया जा रहा है कि एक पटवारी को छुट्टी पर भेजा गया, जबकि उसी टीम द्वारा कई कार्यवाही कर धान माफिया नेटवर्क की परतें खुलने लगी थीं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि—
➡️ नायब तहसीलदार पर कार्रवाई करने के बजाय पटवारी को टारगेट करना,
एक संदेश देता है कि “धान माफिया राज करेगा” और कार्रवाई करने वाले कर्मचारी दबाए जाएंगे।
🟨 पुलिस की भूमिका भी संदेह में:
जानकारी के अनुसार, 8 जनवरी सुबह 03:57 बजे नायब तहसीलदार ने बिना नंबर की पिकअप को दो पुलिस कर्मियों को सुपुर्द किया था।
लेकिन इसके बाद सवाल उठता है कि—
🔴 वाहन को गैर-प्रशासनिक व्यक्ति/कर्मचारी को किसके आदेश पर सुपुर्द किया गया?
🔴 कोचियों को वाहन निकालने का समय कैसे और क्यों मिला?
यही कारण है कि पुलिस बयान और कार्रवाई दोनों संदेह के घेरे में हैं।
🟥 सीमा क्षेत्र में धान तस्करी का “कॉरिडोर”, पर बड़ी कार्रवाई क्यों नहीं?
वाड्रफनगर–बसंतपुर क्षेत्र लंबे समय से सीमा पार धान तस्करी के लिए संवेदनशील माना जाता है। हर सीजन में जप्ती की खबरें आती हैं, लेकिन—
🔴ड्राइवर फरार
🔴वाहन छूट गया
🔴धान का क्या हुआ… स्पष्ट नहीं
ऐसे मामलों में अक्सर बड़ी मछलियों तक पहुंच नहीं होती, और मामला दबा दिया जाता है।
✅ प्रशासनिक जवाबदेही तय हो: जनता की मांग:
यह मामला केवल 65 बोरियों या एक वाहन का नहीं, बल्कि प्रशासन–पुलिस–माफिया गठजोड़ के आरोपों का है।
इसलिए जरूरी है कि—
✔️ जप्ती के बाद की पूरी फाइल सार्वजनिक की जाए
✔️ वाहन किस आदेश पर छोड़ा गया—लिखित आदेश सामने आए
✔️ SDM वाड्रफनगर की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो
✔️ फरार आरोपियों पर FIR, तलाश और कुर्की की कार्रवाई हो
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक यह संदेह बना रहेगा कि वाड्रफनगर में कानून नहीं, बल्कि “रोज़ी रेट” चलता है।
🟥 भारत सम्मान की नजर SDM वाड्रफनगर पर!
लोगों का कहना है—“पैसा खुदा तो नहीं, पर खुदा से कम भी नहीं…” और इस कथन का पालन कई जगह खुलेआम होते देखा जा रहा है। मामले की अगली कड़ी में और भी खुलासे संभव हैं।








