
संपादक धीरेंद्र कुमार जायसवाल/ खबरों की सब्ज़ी मंडी: जहाँ ‘सच’ सड़ रहा है और ‘झूठ’ ऊँचे दामों पर बिक रहा है!
पत्रकारिता या चाटुकारिता? मिशन से कमीशन तक का शर्मनाक सफ़र
चौथा स्तंभ ढह रहा है: खबरों की मंडी में निष्पक्षता का ‘दिवालियापन’
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ या सत्ता का शोरूम? पत्रकारिता के गिरते स्तर का कच्चा चिट्ठा
✍️ आदित्य गुप्ता। अम्बिकापुर।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आज अपनी ही नींव खोता हुआ दिखाई दे रहा है। जिसे कभी समाज का मिशन माना जाता था, वह अब खुलेआम कमीशन का खेल बन चुका है। पत्रकारिता आज उस सब्ज़ी मंडी में तब्दील हो गई है, जहाँ सच की ताज़गी नहीं, बल्कि उस ‘माल’ की कीमत लगती है जो सत्ता और पूँजी के स्वाद के अनुकूल हो।
पेड मीडिया और मृत आत्माएँ:
चमचमाते न्यूज़ स्टूडियो, ऊँची आवाज़ में चीखते एंकर और आक्रामक डिबेट—इन सबके शोर में कहीं दब गई है निष्पक्षता की आख़िरी साँस। यह कैसी विडंबना है कि आज झूठ को सच और सच को झूठ साबित करने के लिए बाकायदा प्राइम टाइम कार्यक्रम रचे जाते हैं।
पूँजीवाद ने मीडिया संस्थानों को इस कदर जकड़ लिया है कि अब समाचार जनहित से नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक हितों से तय होते हैं। महंगे लाइफ़स्टाइल और झूठी शोहरत के दलदल में फँसे कुछ पत्रकार ऐसे कैद हो चुके हैं कि चाहकर भी इस व्यवस्था से बाहर नहीं निकल पा रहे। रात की नींद के लिए नशे का सहारा शायद उसी आत्मग्लानि को दबाने की कोशिश है, जो सच को गिरवी रखने से जन्म लेती है।
मुद्दों से भटकाव: पाकिस्तान के टमाटर बनाम भारत की असल चुनौतियाँ:
आज टीवी स्क्रीन पर स्वास्थ्य, शिक्षा, बेरोज़गारी, महँगाई और बुनियादी ढाँचे जैसे ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा की जगह पड़ोसी देशों की गरीबी का तमाशा परोसा जा रहा है। सवाल उठता है—हमें पाकिस्तान में टमाटर के दाम से क्या लेना-देना?
अगर तुलना करनी ही है, तो अमेरिका और चीन से कीजिए—जहाँ तकनीक, शोध, शिक्षा और जीवन स्तर में वे हमसे आगे क्यों हैं? लेकिन नहीं, मुख्यधारा के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता की चाटुकारिता में इस कदर डूब चुका है कि जनता का ध्यान भटकाने वाले मुद्दे ही उसकी प्राथमिकता बन गए हैं।
क्या निष्पक्षता अब सिर्फ़ डिक्शनरी का शब्द है?
आज निष्पक्ष पत्रकार आटे में नमक के बराबर रह गए हैं। व्यवस्था का दबाव और पूँजी का लालच पत्रकारिता की आत्मा को खोखला कर चुका है। अगर पत्रकारिता आज भी जीवित है, तो उसका धर्म है—सत्तासीन सरकार से, चाहे वह किसी भी दल की हो, तीखे और असहज सवाल पूछना।
लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब मीडिया सत्ता का प्रवक्ता नहीं, बल्कि जनता का वकील बनेगा। अगर आज भी पाठक और दर्शक नहीं जागे, तो सूचनाओं का यह विकृत बाज़ार हमारे भविष्य को अंधकार की ओर धकेल देगा।
अब समय आ गया है कि खबरों की इस सब्ज़ी मंडी में हम ताज़े सच और सड़े हुए प्रोपेगेंडा के बीच फर्क करना सीखें—वरना कल को सच पूरी तरह सड़ चुका होगा और झूठ ही हमारी रोज़मर्रा की खुराक बन जाएगा।
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