
42 साल बाद भी भोपाल गैस त्रासदी की टीस आँखें नम कर देती है
जय जोहार सीजी न्यूज़ | संवाददाता – हरीराम देवांगन
जांजगीर–चांपा (छत्तीसगढ़)
आज से 42 वर्ष पहले घटित भोपाल गैस त्रासदी की भयावह यादें आज भी लोगों की आँखें नम कर देती हैं। विकास के नाम पर स्थापित एक औद्योगिक संयंत्र किस तरह मिनटों में मौत का पर्याय बन गया, इसका सबसे काला उदाहरण यह त्रासदी है।

आधुनिक और औद्योगिक युग में कल–कारखानों एवं प्लांटों की स्थापना विकास और रोजगार के नाम पर होती रही है और आगे भी होती रहेगी। इसी सोच के तहत कई वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के परिधि क्षेत्र में यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड नामक कीटनाशक निर्माण फैक्ट्री की स्थापना की गई थी। उद्देश्य था—रोजगार उपलब्ध कराना और औद्योगिक विकास को गति देना।
लेकिन 3 दिसंबर 1984 की रात लगभग 12:30 से 1:00 बजे के बीच यह संयंत्र विकास का नहीं बल्कि मौत का कारखाना बन गया। अचानक फैक्ट्री से जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) गैस का रिसाव शुरू हुआ और चंद मिनटों में हजारों निर्दोष लोग मौत के आगोश में समा गए।

स्थिति की भयावहता तब और बढ़ गई जब गैस रिसाव की जानकारी मिलने के बावजूद इसे गंभीरता से नहीं लिया गया। कई रिपोर्टों के अनुसार कर्मचारी, सुपरवाइजर और जिम्मेदार अधिकारी मौके पर पहुँचे भी, लेकिन यह सोचकर कि रिसाव थोड़ी देर में अपने आप ठीक हो जाएगा, आवश्यक कदम नहीं उठाए गए। यही घातक लापरवाही इस त्रासदी का मुख्य कारण बनी।
इस जहरीली गैस ने यूनियन कार्बाइड प्लांट के आसपास से लेकर लगभग 16 से 20 किलोमीटर के दायरे में तबाही मचा दी। लोग नींद में ही दम तोड़ते चले गए। सड़कों पर लाशें बिछ गईं, अस्पतालों में जगह नहीं बची और पूरा भोपाल शोक में डूब गया।
यह हादसा न केवल औद्योगिक इतिहास की सबसे भयावह दुर्घटनाओं में दर्ज हुआ, बल्कि आज भी हजारों परिवार इसके दुष्परिणाम झेल रहे हैं। पीढ़ियाँ गुजर गईं, लेकिन पीड़ितों का दर्द, बीमारियाँ और न्याय की लड़ाई अब भी जारी है।
भोपाल गैस त्रासदी यह चेतावनी देती है कि विकास यदि मानवीय सुरक्षा के बिना हो, तो वह विनाश में बदल जाता है।
(भोपाल गैस त्रासदी से जुड़ी मार्मिक कहानियों की अगली कड़ी जल्द ही अपने सुधी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी।)








