
तिल्दा–नेवरा, बैकुंठ मदिरा दुकानों में खुलेआम ओवररेट की वसूली….
प्लेसमेंट कंपनी, आबकारी विभाग और उड़नदस्ता मौन — सवालों के घेरे में पूरा सिस्टम…
तिल्दा–नेवरा | विशेष रिपोर्ट
तिल्दा, नेवरा और बैकुंठ क्षेत्र की शासकीय मदिरा दुकानों में इन दिनों ओवररेट का खेल बेखौफ जारी है। निर्धारित मूल्य से ₹10 या उससे अधिक वसूली आम बात हो चुकी है, लेकिन जिम्मेदार विभाग आंख मूंदे बैठे हैं। सवाल यह नहीं कि ओवररेट हो रहा है, सवाल यह है कि आखिर किसके संरक्षण में यह खेल चल रहा है?
स्थानीय मदिरा प्रेमियों का कहना है कि दुकानों में जिस ब्रांड के नाम से शराब मांगी जाती है, वह उपलब्ध नहीं कराई जाती, बल्कि मनमाने ढंग से दूसरी बोतल थमा दी जाती है। जब ग्राहक आपत्ति करता है, तो जवाब मिलता है— “यही मिलेगा, लेना है तो लो।”
अवैध शराब में हर ब्रांड, शासकीय दुकान में ‘कमी’ क्यों?
हैरानी की बात यह है कि गांवों में बिक रही अवैध शराब में हर ब्रांड आसानी से उपलब्ध है। जिस नाम से मांगो, वही मिल जाता है। इससे यह संदेह और गहराता है कि शासकीय दुकान और अवैध शराब के बीच कोई न कोई सांठगांठ जरूर है।
सेल्समैन अकेला नहीं, मास्टरमाइंड कौन?
यह मानना मुश्किल है कि कोई सेल्समैन अकेले इतना बड़ा जोखिम उठा सकता है। साफ है कि इसके पीछे
प्लेसमेंट कंपनी!
संबंधित आबकारी अधिकारी!
उड़नदस्ता टीम!
की मौन सहमति या संरक्षण जरूर है। यदि ऐसा नहीं है, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
रेट घटता है कागजों में, बढ़ता है काउंटर पर:
एक तरफ शासन मदिरा की दरें घटाने का दावा करता है, तो दूसरी ओर उसी शासकीय दुकान में उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा डाका डाला जा रहा है। यह दोहरा रवैया आम जनता के साथ खुला अन्याय है।
कब टूटेगा ओवररेट का यह सिंडिकेट?
स्थानीय लोगों में भारी नाराजगी है। उनका साफ सवाल है— “आखिर कब तक मदिरा प्रेमियों की जेब कटती रहेगी? और कब तक जिम्मेदार विभाग मौन साधे रहेंगे?”
अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इस खबर को गंभीरता से लेकर जांच करता है या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन हो जाएगा।








