
स्वतंत्र, सच्ची और निर्भीक पत्रकारिता ही लोकतंत्र की असली ताकत
संवाददाता धीरेंद्र जायसवाल की कलम से……✍️
तिल्दा नेवरा रायपुर/ लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावों से तय नहीं होती, बल्कि उस व्यवस्था से तय होती है जिसमें सच बोलने और सच लिखने की आज़ादी सुरक्षित हो। पत्रकारिता को यूं ही लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं कहा जाता। यह वह शक्ति है जो सत्ता से सवाल करती है, समाज को आईना दिखाती है और आमजन की आवाज़ को मंच प्रदान करती है।
आज के दौर में जब सूचना के अनेक माध्यम मौजूद हैं, तब सच्ची और जिम्मेदार पत्रकारिता की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है। पत्रकारिता का जीवित रहना इस स्वतंत्र लोकतंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि यदि पत्रकारिता बचेगी तो संविधान बचेगा, और संविधान बचेगा तो लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा।
हर संघर्ष जीतने के लिए नहीं लड़ा जाता। कुछ लड़ाइयाँ इसलिए भी लड़ी जाती हैं ताकि दुनिया को यह बताया जा सके कि कोई है, जो अन्याय के खिलाफ खड़ा है। यही पत्रकारिता का मूल धर्म है — सच के साथ खड़ा होना, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों।
पत्रकार केवल खबर लिखने वाला व्यक्ति नहीं होता, वह समाज की नब्ज़ पहचानने वाला प्रहरी होता है। उसकी कलम में वह ताकत होती है जो जनभावनाओं को दिशा दे सकती है और व्यवस्था को जवाबदेह बना सकती है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि पत्रकारिता स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक बनी रहे।
आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज भी सच्ची पत्रकारिता का सम्मान करे और उसे मजबूती प्रदान करे। क्योंकि जब कलम स्वतंत्र रहती है, तभी लोकतंत्र मजबूत रहता है।
अंततः यह याद रखना होगा —
“तुम ही हो पत्थर, इमारत तुम्हीं हो,
“कलम जब सच लिखती है, तो सत्ता भी जवाब देने को मजबूर हो जाती है।”
“सच की राह कठिन जरूर है, पर इतिहास हमेशा उसी के साथ खड़ा होता है।”
“आवाज़ दबाई जा सकती है, मगर सच को मिटाया नहीं जा सकता।”
“जहां अन्याय होगा, वहां कलम खामोश नहीं रहेगी।”
“हमारी लड़ाई किसी व्यक्ति से नहीं, व्यवस्था में छिपे अन्याय से है।”
स्वतंत्र, सच्ची और निर्भीक पत्रकारिता ही राष्ट्र की असली ताकत है।








