
संवाददाता धीरेन्द्र कुमार जायसवाल/ओटगन में बर्बर हमला: युवक के दोनों पैर व हाथ तोड़े, 19 वर्षीय युवती भी घायल — ‘चयनात्मक कार्रवाई’ और काउंटर केस पर उठे गंभीर सवाल
रायपुर (ग्रामीण)
तिल्दा नेवरा थाना क्षेत्र के ग्राम ओटगन में हुई बर्बर मारपीट की घटना ने कानून-व्यवस्था और पुलिस कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर जहां हमले में युवक के दोनों पैर और एक हाथ तोड़ दिए गए, वहीं बीच-बचाव करने पहुंची 19 वर्षीय युवती का भी पैर तोड़ दिया गया। घटना की गंभीरता के बावजूद अब तक ठोस कार्रवाई नहीं होने से स्थानीय लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, 16 मार्च 2026 की सुबह करीब 5 बजे ग्राम निवासी उदल यदु तालाब की ओर जा रहे थे, तभी पहले से घात लगाए आरोपियों ने उन पर लाठी-डंडों से हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल उदल यदु का इलाज जारी है। घटना के दौरान यामिनी यदु (19 वर्ष) भी हमले की शिकार हो गईं।
⚖️ गंभीर अपराध, लेकिन धाराएं हल्की?
पीड़ित पक्ष का आरोप है कि इतनी गंभीर और जानलेवा घटना के बावजूद पुलिस द्वारा हल्की एवं जमानती धाराओं में मामला दर्ज किया गया है, जिससे न्याय मिलने में बाधा उत्पन्न हो रही है। सवाल उठता है कि जब किसी व्यक्ति के हाथ-पैर तोड़ दिए जाएं, तो क्या यह साधारण अपराध की श्रेणी में आता है?
❗ “छोटी घटनाएं हेडलाइन, बड़े मामले साइलेंट?”
स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुलिस द्वारा छोटी-छोटी घटनाओं, जैसे—सड़क या एकांत स्थानों पर शराब पीते लोगों को पकड़कर! प्रेस विज्ञप्ति जारी कर!
मीडिया और अखबारों में प्रचारित कर!
वाहवाही लूटी जा रही है, जबकि गरीब और असहाय लोगों पर तुरंत धाराएं लगाई जाती हैं।
इसके विपरीत, ओटगन जैसे गंभीर मामलों— हाथ-पैर तोड़ने जैसी घटनाओं—में अपेक्षित सख्ती और पारदर्शिता नहीं दिखाई दे रही। ऐसे मामलों में न तो प्रेस विज्ञप्ति जारी होती है और न ही व्यापक जानकारी सामने आती है।
⚠️ काउंटर केस का खेल?
पीड़ित पक्ष ने आरोप लगाया है कि थाना में शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है। उनका कहना है कि—कई मामलों में पीड़ित के पहुंचने से पहले ही विरोधी पक्ष का काउंटर आवेदन दर्ज हो जाता है
इससे मूल शिकायत कमजोर पड़ जाती है!
यह स्थिति न्याय प्रक्रिया पर प्रभाव डालती है और संरक्षण (प्रोटेक्शन) की आशंका पैदा करती है
🎤 थाना स्तर पर पारदर्शिता पर भी सवाल:
थाना प्रभारी से जानकारी या बाइट लेने के प्रयास पर यह कहा जाता है कि उन्हें इसकी अनुमति नहीं है और उच्च अधिकारियों का हवाला दिया जाता है।
इस पर सवाल उठ रहा है कि—क्या अब थाना स्तर पर बाइट देने के नियम बदल गए हैं? या फिर जानकारी साझा करने से बचा जा रहा है?
स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले ऐसे मामलों में थाना स्तर पर जानकारी दी जाती थी, लेकिन अब स्पष्ट जवाब नहीं मिल रहा।
📢 पीड़ित पक्ष की मांग:
पीड़ित परिवार और ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि—मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए! गंभीर धाराएं जोड़कर कड़ी कार्रवाई की जाए!
सभी आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी सुनिश्चित की जाए! पीड़ित परिवार को सुरक्षा प्रदान की जाए!
🔎 प्रशासन की अग्निपरीक्षा:
यह मामला अब केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्राथमिकता, पारदर्शिता और जवाबदेही का भी बड़ा मुद्दा बन गया है।
अब देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस गंभीर मामले में क्या ठोस कदम उठाते हैं और जनता का विश्वास कायम कर पाते हैं या नहीं।
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