
संवाददाता धीरेंद्र कुमार जायसवाल/ चाटुकारिता नहीं, सच्चाई चाहिए: जमीनी पत्रकारिता से ही बनेगा जनता का विश्वास
📍 तिल्दा नेवरा।
आज के दौर में पत्रकारिता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ उसे तय करना है कि वह सत्ता की चाटुकारिता का माध्यम बनेगी या फिर समाज के दबे-कुचले, गरीब और मजलूम लोगों की आवाज़।
लगातार यह देखा जा रहा है कि कई मंचों पर असल मुद्दों को दरकिनार कर दिखावटी खबरों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि गांव-गांव, कस्बों और शहरों के कोनों में बैठे गरीब मजदूर, किसान और जरूरतमंद लोग आज भी अपनी समस्याओं के समाधान के लिए तरस रहे हैं।
पत्रकारिता का असली उद्देश्य सिर्फ खबर दिखाना नहीं, बल्कि उन आवाज़ों को सामने लाना है जो अक्सर दबा दी जाती हैं। शासन-प्रशासन की योजनाएं कागजों में तो दिखती हैं, लेकिन क्या वे सही मायनों में ज़मीन पर उतर रही हैं? यह सवाल उठाना और उसकी सच्चाई जनता तक पहुंचाना ही सच्ची पत्रकारिता है।
जब मीडिया अपना कैमरा उन जगहों की ओर घुमाएगा जहां दर्द है, जहां तकलीफ है, जहां अन्याय है—तभी पत्रकारिता अपनी असली भूमिका निभाएगी।
जनता और पत्रकार के बीच विश्वास का रिश्ता तभी मजबूत होगा जब खबरों में सच्चाई होगी, निष्पक्षता होगी और जनहित सर्वोपरि होगा।
आज जरूरत है ऐसी पत्रकारिता की जो सत्ता से सवाल पूछे, गरीबों की आवाज़ बने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का माध्यम बने।
अगर पत्रकारिता सच के साथ खड़ी होगी, तो जनता खुद-ब-खुद उसके साथ खड़ी होगी।
जो सच लिखेगा वही दिलों में बस जाएगा,
पत्रकार वही जो जनता का बन जाएगा।















