
दहेज़ विरोधी जन जागरण अभियान: समाज सुधार की दिशा में मथुरा से उठी सशक्त आवाज
मथुरा। शहर में दहेज़ जैसी कुप्रथा और विवाह से जुड़ी फिजूलखर्ची के खिलाफ एक महत्वपूर्ण दहेज़ विरोधी जन जागरण अभियान का आयोजन किया गया। इस अभियान में समाज के जागरूक नागरिकों, बुद्धिजीवियों और बड़ी संख्या में युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
अभियान का मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त एक गैर-संवैधानिक और अमानवीय प्रथा दहेज़ के विरुद्ध जनमत तैयार करना, तथा विवाह के नाम पर होने वाली फिजूलखर्ची, दिखावे और गैर-शरई रस्मों पर रोक लगाना रहा। जन जागरण में शामिल लोगों ने सर्वसम्मति से यह राय रखी कि इस सामाजिक मुहिम को उलमा-ए-हज़रात के नेतृत्व में आगे बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि धार्मिक, नैतिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक जागरूकता लाई जा सके।

गैर-शरई और अनावश्यक रस्मों पर रोक की अपील: अभियान के दौरान विशेष रूप से इस बात पर ज़ोर दिया गया कि शादी-विवाह में होने वाली गैर-शरई और अनावश्यक रस्मों को पूरी तरह बंद किया जाए। वक्ताओं ने कहा कि लड़की पक्ष पर समाज की दावत के नाम पर डाले जाने वाले अतिरिक्त आर्थिक बोझ को समाप्त किया जाना चाहिए।
समाज के बुद्धिजीवियों का मत था कि यदि समाज यह संकल्प ले ले कि बेटी की शादी में सामूहिक भोज नहीं किया जाएगा, तो एक परिवार के 5 से 10 लाख रुपये तक की बचत संभव है। इससे समाज के कमजोर वर्गों को बड़ी राहत मिलेगी और गलत परंपराओं पर स्वतः अंकुश लगेगा।
डीजे और भारी बारात पर चिंता: जन जागरण में शादी-विवाह में डीजे और भारी बारात से होने वाले दुष्प्रभावों पर भी चिंता व्यक्त की गई। वक्ताओं ने बताया कि इससे ध्वनि प्रदूषण फैलता है, बीमारों और बुजुर्गों को भारी परेशानी होती है, रास्ते अवरुद्ध हो जाते हैं और कई बार एंबुलेंस तक को निकलने में कठिनाई होती है। इसलिए समाज को जागरूक होकर इन गैर-शरई और हानिकारक प्रथाओं को समाप्त करने का संकल्प लेना चाहिए।
मस्जिद में निकाह पर ज़ोर: अभियान का तीसरा अहम बिंदु यह रहा कि निकाह मस्जिद में ही संपन्न कराया जाए। वक्ताओं ने कहा कि मस्जिद से अधिक पवित्र स्थान कोई नहीं होता और निकाह जैसे पवित्र बंधन का पवित्र स्थल पर होना ही उचित है। आजकल अनुपयुक्त स्थानों पर निकाह होने से अनेक सामाजिक बुराइयाँ जन्म ले रही हैं, जिनसे मस्जिद में निकाह कराकर बचा जा सकता है।
व्यापक सामाजिक संदेश: यह जन जागरण अभियान केवल दहेज़ विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे—
- आर्थिक शोषण के खिलाफ आंदोलन,
- सामाजिक दिखावे के विरुद्ध चेतना,
- पर्यावरण और जन-स्वास्थ्य की रक्षा,
- तथा इस्लामी और नैतिक मूल्यों की ओर वापसी
के रूप में देखा गया।
अभियान के अंत में बड़ी संख्या में युवाओं ने उपरोक्त तीनों बिंदुओं पर संकल्प लिया और इस सामाजिक मुहिम को दिल खोलकर समर्थन दिया। आयोजकों का कहना है कि यदि समाज आज ठोस संकल्प ले ले, तो आने वाली पीढ़ियाँ एक न्यायपूर्ण, सरल और गरिमामय विवाह व्यवस्था की साक्षी बनेंगी।








