
बोर्ड परीक्षा में “टॉप टेन” का बढ़ता दबाव, शिक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
रिजल्ट अच्छा तो स्कूल का नाम रोशन, छात्र आत्महत्या करे तो जिम्मेदार कौन?
जांजगीर-चांपा। बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम घोषित होने के बाद हर वर्ष “टॉप टेन” सूची को लेकर जिस तरह का माहौल बनाया जाता है, उस पर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। शिक्षा विभाग द्वारा टॉपर्स की सूची जारी करने और निजी स्कूलों द्वारा उसका बड़े स्तर पर प्रचार-प्रसार करने से जहां सफल छात्रों को सम्मान मिलता है, वहीं कम अंक पाने वाले अथवा असफल छात्र मानसिक दबाव और हीन भावना का शिकार हो रहे हैं।
पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि बोर्ड परीक्षा में टॉप करने वाले विद्यार्थियों के नाम और उनके स्कूलों को बड़े स्तर पर प्रचारित किया जाता है। निजी स्कूल संचालक भी इसे अपनी उपलब्धि बताकर प्रचार अभियान चलाते हैं। जबकि शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि किसी छात्र की सफलता उसके व्यक्तिगत परिश्रम, पारिवारिक सहयोग और लगन का परिणाम होती है। यदि विद्यालय की शिक्षा व्यवस्था ही पूरी तरह जिम्मेदार होती, तो एक ही स्कूल से बड़ी संख्या में विद्यार्थी शीर्ष सूची में दिखाई देते।
इधर, कम अंक आने या परीक्षा में असफल होने पर कई छात्र मानसिक तनाव में आकर आत्मघाती कदम उठा रहे हैं। हाल ही में जांजगीर-चांपा जिले के कुदरी बैराज में एक छात्र द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया है। माना जा रहा है कि परीक्षा परिणाम और मानसिक दबाव भी इसकी एक वजह हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि बोर्ड परीक्षा में टॉप करना निश्चित रूप से एक उपलब्धि है, लेकिन इसे जीवन की अंतिम मंजिल मान लेना गलत है। टॉप टेन में आने के बाद भी विद्यार्थियों को मेडिकल, इंजीनियरिंग या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अलग से कठिन मेहनत करनी पड़ती है। उन्हें बिना परीक्षा के किसी बड़े संस्थान में प्रवेश नहीं मिलता और न ही कोई विशेष सरकारी सुविधा स्वतः प्राप्त होती है।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर “टॉप टेन” को लेकर इतना बड़ा माहौल क्यों बनाया जा रहा है? क्या यह शिक्षा के अधिकार अधिनियम की मूल भावना के अनुरूप है? आलोचकों का कहना है कि शिक्षा विभाग और निजी स्कूलों की यह प्रचार संस्कृति अनजाने में छात्रों के बीच प्रतिस्पर्धा से अधिक मानसिक दबाव पैदा कर रही है।
शिक्षाविदों का मानना है कि अब जरूरत इस बात की है कि शिक्षा व्यवस्था केवल अंकों और रैंकिंग तक सीमित न रहे, बल्कि विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और समग्र विकास पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाए।
जय जोहार सीजी न्यूज़
संवाददाता – हरि राम देवांगन














