
संवाददाता धीरेंद्र कुमार जायसवाल/ सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का फैसला किया खारिज
पीड़िता की मां बोलीं – “न्याय में भरोसा बहाल हुआ”
नई दिल्ली/प्रयागराज। Supreme Court of India ने Allahabad High Court के उस विवादित फैसले को खारिज कर दिया है, जिसमें नाबालिग पीड़िता के वक्ष पकड़ने और सलवार का नाड़ा खोलने की हरकत को बलात्कार का “प्रयास” नहीं बल्कि केवल “तैयारी” माना गया था। शीर्ष अदालत के इस निर्णय के बाद पीड़िता की मां ने राहत की सांस लेते हुए कहा कि उनका न्याय व्यवस्था पर भरोसा फिर से कायम हुआ है।
प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की खंडपीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को “स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण” और आपराधिक कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत बताते हुए निरस्त कर दिया। साथ ही, अदालत ने ‘यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम’ के तहत दोनों आरोपियों पर लगे बलात्कार के प्रयास के आरोप बहाल कर दिए।
11 वर्षीय बच्ची के साथ हुई थी घटना:
नवंबर 2021 में उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में दो युवकों ने 11 वर्षीय बच्ची को जबरन घसीटकर पुलिया के नीचे ले जाकर उसके कपड़े उतारने की कोशिश की थी। बच्ची की चीख-पुकार सुनकर पहुंचे राहगीरों के कारण आरोपी मौके से फरार हो गए।
मार्च 2025 में हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि यह कृत्य केवल बलात्कार की “तैयारी” है, जिससे आरोपों की गंभीरता कम हो गई थी। इस निर्णय के खिलाफ बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले नेटवर्क Just Rights for Children (जेआरसी) ने पीड़िता की ओर से सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी।
सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्देश:
शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए National Judicial Academy, भोपाल को निर्देश दिया है कि वह यौन शोषण से जुड़े संवेदनशील मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों में संवेदनशीलता विकसित करने हेतु व्यापक दिशानिर्देश तैयार करने के लिए एक समिति गठित करे।
अकादमी को तीन महीने के भीतर रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपने को कहा गया है। साथ ही, अदालत ने जेआरसी से भी सुझाव आमंत्रित किए हैं।
पीड़िता की मां और अधिवक्ताओं की प्रतिक्रिया:
पीड़िता की मां ने कहा,
“इस फैसले से मेरा यह विश्वास बहाल हुआ है कि कानून बच्चों और पीड़ितों की रक्षा कर सकता है। अब उम्मीद है कि किसी बच्चे को अपने साथ हुए अत्याचार को साबित करने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ेगा।”
जेआरसी की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एच. एस. फूलका ने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि यह बच्चों की सुरक्षा को सुदृढ़ करने की दिशा में दूरगामी कदम है।
नेटवर्क के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत ने कहा कि यह निर्णय न्याय, गरिमा और संवेदनशीलता सुनिश्चित करने की दिशा में लंबे संघर्ष का परिणाम है।
न्यायिक तंत्र में बढ़ेगी संवेदनशीलता:
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि यौन हिंसा से जुड़े मामलों में न्यायिक विवेचना संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित होनी चाहिए। इससे भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई में अधिक सतर्कता और जिम्मेदारी सुनिश्चित होगी।














