
ब्रेकिंग न्यूज़/अदालत से बरी होने के बावजूद नहीं हटाई गई ब्लैक लिस्टिंग
चार साल की न्यायिक लड़ाई के बाद भी धीरेंद्र जायसवाल को न्याय अधूरा
रायपुर।
न्यायालय से पूर्ण रूप से दोषमुक्त होने के बावजूद प्रशासनिक हठधर्मिता और विभागीय लापरवाही का शिकार बने धीरेंद्र जायसवाल को आज भी “ब्लैक लिस्ट” की सजा भुगतनी पड़ रही है। चार वर्षों तक मानसिक, सामाजिक और आर्थिक प्रताड़ना झेलने के बाद जब अदालत ने उन्हें फर्जी आरोपों से मुक्त कर दिया, तब भी संबंधित विभागों ने अब तक उनकी ब्लैक लिस्टिंग हटाने की कोई कार्रवाई नहीं की है।
फर्जी आरोप, लेकिन अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं:
मामला वर्ष 2020 का है, जब धीरेंद्र जायसवाल पर आबकारी अधिनियम के तहत आरोप लगाकर उन्हें कार्य से पृथक कर दिया गया। इस पूरे प्रकरण में जिस अधिकारी की भूमिका संदिग्ध रही, वह न तो आरोप सिद्ध कर सका और न ही उसके खिलाफ आज तक कोई विभागीय कार्रवाई की गई।

कोर्ट का स्पष्ट फैसला—आरोप साबित नहीं:
न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय श्रेणी, रायपुर ने 18 मार्च 2024 को दिए गए अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को “संदेह से परे प्रमाणित करने में पूरी तरह विफल रहा”। कोर्ट ने यह भी माना कि गवाहों ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया और पूरी कार्रवाई संदेह के घेरे में रही। परिणामस्वरूप धीरेंद्र जायसवाल को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया गया
चार साल की पीड़ा: मानसिक, आर्थिक और सामाजिक नुकसान:
धीरेंद्र जायसवाल बताते हैं कि—
• चार साल तक कोर्ट के चक्कर काटने पड़े!
• कोरोना काल में रोज़गार छिन गया!
• परिवार आर्थिक तंगी में चला गया!
• समाज में बदनामी झेलनी पड़ी!
• मानसिक तनाव और अपमान सहना पड़ा!
इसके बावजूद जिस विभाग ने उन्हें ब्लैक लिस्ट किया था, वही विभाग अब कोर्ट के आदेश को नजरअंदाज कर रहा है।
विभागों में कई बार दिया आवेदन, फिर भी चुप्पी:
दोषमुक्ति के बाद धीरेंद्र जायसवाल ने संबंधित विभागों में लिखित आवेदन देकर ब्लैक लिस्ट हटाने की मांग की, लेकिन महीनों बीत जाने के बावजूद कोई आदेश जारी नहीं हुआ। यह स्थिति सवाल खड़े करती है कि क्या प्रशासन न्यायालय के आदेशों से ऊपर है?
प्रशासनिक तानाशाही या बदले की भावना?
कानूनी जानकारों का कहना है कि जब कोई व्यक्ति न्यायालय से बरी हो जाता है, तो उसके खिलाफ की गई दंडात्मक प्रशासनिक कार्रवाई स्वतः समाप्त होनी चाहिए। इसके बावजूद ब्लैक लिस्टिंग बनाए रखना न केवल संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का उल्लंघन है, बल्कि यह सत्ता के दुरुपयोग का भी संकेत देता है।

अब सवाल सिर्फ धीरेंद्र का नहीं:
यह मामला अब सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है—
• जो फर्जी केस दर्ज कर लेती है
• लेकिन गलत करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं करती
• और निर्दोष साबित हो चुके व्यक्ति को भी न्याय नहीं देती
धीरेंद्र जायसवाल की मांग:
धीरेंद्र जायसवाल ने मांग की है कि—
1. तत्काल प्रभाव से उनकी ब्लैक लिस्टिंग हटाई जाए
2. चार साल की मानसिक व आर्थिक क्षति का मुआवज़ा दिया जाए
3. फर्जी मामला गढ़ने वाले अधिकारियों पर विभागीय व कानूनी कार्रवाई हो
न्यायालय ने अपना काम कर दिया, अब सवाल यह है—क्या प्रशासन भी कानून मानेगा या फिर एक निर्दोष को यूँ ही सज़ा भुगतने पर मजबूर रखा जाएगा?
⚖️ “फैसला आया इंसाफ़ का,
पर फाइलों में कैद रह गया—न्याय!”









