
संपादक धीरेंद्र कुमार जायसवाल/ 6 साल तक गोचर को ‘निजी’ बताने का खेल उजागर
पूर्व विधायक का कब्ज़ा बेनकाब, अवैध पट्टा निरस्त
बलरामपुर–रामानुजगंज | जय जोहार सीजी न्यूज़
छत्तीसगढ़ के बलरामपुर–रामानुजगंज जिले से सामने आया यह मामला केवल ज़मीन विवाद नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम की पोल खोलता है जहाँ राजनीतिक रसूख के आगे कानून वर्षों तक बंधक बना रहा।
ग्राम मानपुर, तहसील शंकरगढ़ की जिस भूमि को राजस्व विभाग लगातार निजी बताता रहा, वह वास्तव में सरगुजा सेटलमेंट 1944–45 के अनुसार शासकीय गोचर (चरागाह) भूमि निकली।
छह वर्षों तक चले इस विवाद का पटाक्षेप आखिरकार 12 दिसंबर 2025 को हुआ, जब अपर कलेक्टर न्यायालय, राजपुर ने अवैध पट्टा निरस्त करते हुए साफ शब्दों में कहा—
यह भूमि शासकीय गोचर है, निजी स्वामित्व का दावा अवैध है।
📍 मामले की जड़: गोचर को निजी बताने का खेल
ग्राम: मानपुर
तहसील: शंकरगढ़
खसरा नंबर: 228/5
रकबा: 0.372 हेक्टेयर
रिकॉर्ड: सरगुजा सेटलमेंट 1944–45 में स्पष्ट रूप से गोचर इसके बावजूद वर्ष 2019 से एक पूर्व विधायक द्वारा भूमि पर कब्ज़ा कर कच्चा निर्माण कराया गया और राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर कर इसे निजी भूमि दर्शाया गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि लगातार शिकायतों के बाद भी राजस्व विभाग इसे निजी भूमि बताता रहा।
⚠️ राजस्व विभाग कटघरे में सवाल साफ हैं—
जब गोचर रिकॉर्ड मौजूद था!
जब कोई मूल पट्टा प्रस्तुत नहीं किया गया!
जब 1990–91 के कथित नामांतरण की मूल प्रति गायब थी!
जब 1954–55 के बाद के तहसीली अभिलेख उपलब्ध नहीं थे!
तो किसके आदेश पर भूमि को निजी घोषित किया गया?
क्या यह महज़ लापरवाही थी या राजनीतिक संरक्षण में किया गया सुनियोजित खेल?
🔍 जांच में क्या आया सामने:
राजस्व निरीक्षक की जांच रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ—
भूमि शासकीय गोचर मद में दर्ज
वैध पट्टा जारी होने का कोई प्रमाण नहीं!
1990–91 का कथित पट्टा संदिग्ध/फर्जी!
शासकीय भूमि पर अवैध कब्ज़ा सिद्ध!
⚖️ अपर कलेक्टर का सख्त फैसला:
दिनांक 12/12/2025 को अपर कलेक्टर न्यायालय ने—
✔ अवैध पट्टा निरस्त किया
✔ राजस्व रिकॉर्ड में तत्काल सुधार के आदेश दिए
✔ स्पष्ट किया कि भूमि शासकीय गोचर है
यह फैसला सिर्फ़ एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र पर करारा तमाचा है, जिसने वर्षों तक गलत को सही साबित करने की कोशिश की।
🔥 दोहरे मापदंडों की सच्चाई:
आम ग्रामीण गोचर पर कब्ज़ा करे तो तुरंत बेदखली,
लेकिन जब कब्जाधारी राजनीतिक रसूख वाला हो—
तो फाइलें दब जाती हैं,
भूमि ‘निजी’ घोषित कर दी जाती है,
और शिकायतकर्ता वर्षों तक दफ्तरों के चक्कर काटता है।
यही वजह है कि यह मामला सिर्फ़ ज़मीन नहीं, बल्कि कानून के राज का सवाल बन जाता है।
❓ गोचर बची… पर सवाल बाकी
दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई कब?
छह साल के अवैध कब्ज़े की जवाबदेही कौन तय करेगा?
क्या ऐसे मामलों की स्वतंत्र जांच होगी?
अगर इन सवालों के जवाब नहीं मिले, तो यह फैसला भी सिस्टम की फाइलों में दबकर रह जाएगा।
✊ जय जोहार सीजी न्यूज़ की दो टूक:
अगर दबाव हटे, तो कानून आज भी ज़िंदा है।
लेकिन असली इम्तिहान अब सिस्टम का है—
क्या वह सुधरेगा या अगली गोचर भूमि किसी और रसूखदार के हवाले कर दी जाएगी?















