
सुमन चेरवा मौत मामला: 20 हजार रुपये की सहायता पर सवाल, पोस्टमार्टम और पुलिस कार्रवाई को लेकर उठे गंभीर संदेह
पीएम रिपोर्ट सामने आने से पहले आत्महत्या का निष्कर्ष कैसे? पोस्टमार्टम के दौरान परिजनों को दूर रखने का आरोप, मजिस्ट्रियल जांच की पारदर्शिता पर भी सवाल
संपादक धीरेंद्र कुमार जायसवाल/9131419735
रायपुर/सूरजपुर-बलरामपुर। करीब 12 वर्षीय आदिवासी नाबालिग बच्ची सुमन चेरवा की संदिग्ध मौत का मामला अब गंभीर सवालों के घेरे में है। परिवार और मामले से जुड़े लोगों की ओर से पोस्टमार्टम प्रक्रिया, पुलिस की शुरुआती कार्रवाई, कथित मजिस्ट्रियल जांच और 20 हजार रुपये की आर्थिक सहायता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने नहीं आई थी, तब पुलिस की ओर से बच्ची की मौत को आत्महत्या के रूप में कैसे प्रस्तुत किया गया? परिजनों का कहना है कि मौत की वास्तविक परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच किए बिना किसी एक निष्कर्ष की ओर बढ़ना उचित नहीं है।
पोस्टमार्टम के दौरान परिजनों को दूर रखने का आरोप
परिजनों की ओर से आरोप लगाया गया है कि पोस्टमार्टम की प्रक्रिया के दौरान उन्हें दूर रखा गया। इसको लेकर कई सवाल उठ रहे हैं—क्या पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी हुई? प्रक्रिया में कौन-कौन अधिकारी मौजूद थे और क्या सभी निर्धारित नियमों का पालन किया गया?
मामले में पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर के कथित बयान का भी उल्लेख किया जा रहा है, जिसमें पंचनामा अथवा संबंधित प्रक्रिया के दौरान पुलिसकर्मियों की मौजूदगी की बात सामने आने का दावा है। यदि ऐसा हुआ है तो पूरी प्रक्रिया की आधिकारिक स्थिति स्पष्ट किया जाना जरूरी है।
मजिस्ट्रियल जांच पर भी सवाल
मृतका के मामले में मजिस्ट्रियल जांच की बात सामने आने के बावजूद उसकी प्रक्रिया और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। लोगों की मांग है कि जांच केवल औपचारिकता न बनकर स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से हो तथा प्रत्येक महत्वपूर्ण तथ्य की जांच की जाए।
20 हजार रुपये की सहायता क्यों?
मामले में 20 हजार रुपये दिए जाने की बात भी चर्चा में है। यदि परिवार को यह राशि दी गई है तो प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि यह राशि किस मद में दी गई, किसके द्वारा दी गई और उसका आधिकारिक रिकॉर्ड क्या है।
परिजनों और स्थानीय लोगों का सवाल है कि आर्थिक सहायता अपनी जगह है, लेकिन किसी नाबालिग की संदिग्ध मौत की निष्पक्ष जांच और न्याय का विकल्प आर्थिक सहायता नहीं हो सकती।
बच्ची वहां कैसे पहुंची, जांच का अहम बिंदु
सुमन चेरवा कथित तौर पर अपने घर और जिले से दूर काम करने पहुंची थी। ऐसे में जांच के दौरान यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि नाबालिग बच्ची वहां कैसे पहुंची, उसे किसने बुलाया, उसके साथ कौन लोग संपर्क में थे और घटना से पहले की परिस्थितियां क्या थीं।
इसके अलावा घटनास्थल, फॉरेंसिक साक्ष्य, मोबाइल/संपर्क संबंधी जानकारी, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और पोस्टमार्टम रिपोर्ट जैसे सभी पहलुओं की जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
एसपी के निर्देशों के पालन पर भी सवाल
मामले में पुलिस अधीक्षक स्तर से दिए गए कथित निर्देशों के पालन को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। यदि किसी वरिष्ठ अधिकारी ने जांच अथवा कार्रवाई को लेकर निर्देश दिए थे, तो उनके पालन की स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। साथ ही, यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
परिवार को चाहिए सच और न्याय
सुमन चेरवा की मौत को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब अब दस्तावेजी और वैज्ञानिक जांच के आधार पर सामने आना चाहिए। यदि मौत आत्महत्या है तो उसके समर्थन में वैज्ञानिक साक्ष्य स्पष्ट होने चाहिए। यदि दुर्घटना है तो परिस्थितियां सामने आनी चाहिए और यदि किसी आपराधिक कृत्य की आशंका है तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
फिलहाल परिजनों और स्थानीय लोगों की मांग है कि मामले की स्वतंत्र मजिस्ट्रियल जांच कराकर पोस्टमार्टम, पंचनामा, घटनास्थल, पुलिस कार्रवाई और 20 हजार रुपये की सहायता से जुड़े सभी पहलुओं को जांच के दायरे में लाया जाए।
इस मामले में लगाए गए आरोपों और सामने आए दावों की स्वतंत्र पुष्टि आधिकारिक जांच एवं दस्तावेज सामने आने के बाद ही हो सकेगी।
बड़ा सवाल
क्या पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने से पहले ही मौत को आत्महत्या मान लिया गया था?
20 हजार रुपये की राशि किस मद में दी गई?
पोस्टमार्टम के दौरान वास्तव में कौन-कौन मौजूद था?
और सुमन चेरवा की मौत का वास्तविक सच आखिर कब सामने आएगा?
एक परिवार को आर्थिक सहायता से ज्यादा जरूरत सच और न्याय की है।


















