
भिलाई स्टील प्लांट से कथित ‘लोहा चोरी’ पर विधायक रिकेश सेन का DGP को खुला पत्र
40 वर्षों में 10 हजार करोड़ की राष्ट्रीय संपत्ति के नुकसान का गंभीर आरोप, पूछा—“छोटे आरोपियों तक ही क्यों सीमित है जांच?”
रायपुर/भिलाई। भिलाई इस्पात संयंत्र (BSP) से कथित तौर पर लंबे समय से हो रही लोहा चोरी का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन ने पुलिस महानिदेशक अरुण देव गौतम के नाम एक खुला पत्र जारी कर इस पूरे मामले की निष्पक्ष और व्यापक जांच की मांग की है।
विधायक ने अपने फेसबुक पोस्ट में दावा किया है कि लगभग 40 वर्षों के दौरान भिलाई स्टील प्लांट से हजारों करोड़ रुपये की राष्ट्रीय संपत्ति को कथित रूप से नुकसान पहुंचाया गया। उन्होंने इस नुकसान का अनुमान करीब 10 हजार करोड़ रुपये बताया है।
हालांकि, विधायक द्वारा लगाए गए इन आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि समाचार लिखे जाने तक सामने नहीं आई है। इसलिए पूरे मामले में निष्पक्ष जांच और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना आवश्यक है।
“छोटी घटनाओं पर संज्ञान लेने वाली पुलिस इतने बड़े नेटवर्क तक क्यों नहीं पहुंच रही?”
विधायक रिकेश सेन ने DGP को लिखे पत्र में सवाल उठाया है कि यदि यह कथित नेटवर्क वर्षों से सक्रिय था, तो जांच अब तक केवल छोटे आरोपियों या निचले स्तर तक क्यों सीमित रही?
उन्होंने मांग की है कि कथित लोहा चोरी के पूरे नेटवर्क की जांच की जाए और यह पता लगाया जाए कि चोरी का माल कहां से निकलता था, कौन उसे परिवहन करता था, कौन खरीदता था, कहां उसका भंडारण होता था और कथित अवैध कमाई का अंतिम लाभार्थी कौन था।
100 से अधिक गाड़ियों को रातों-रात काटने का दावा
विधायक ने अपने पोस्ट में यह भी सवाल उठाया है कि कथित तौर पर लोहा परिवहन से जुड़े 100 से अधिक वाहनों को रातों-रात काट दिया गया।
उन्होंने इन वाहनों का पूरा रिकॉर्ड RTO से निकलवाने और वाहन मालिकों तथा उनसे जुड़े ट्रांसपोर्ट नेटवर्क की जांच कराने की मांग की है।
जांच में यह सवाल महत्वपूर्ण हो सकते हैं—
- वाहन किन लोगों या कंपनियों के नाम पर पंजीकृत थे?
- वाहन कब खरीदे गए और कब काटे गए?
- उन्हें कब और किन परिस्थितियों में स्क्रैप किया गया?
- क्या किसी जांच के दौरान इनके रिकॉर्ड सुरक्षित किए गए थे?
- इन वाहनों का BSP से कथित माल परिवहन से क्या संबंध था?
यदि इन दावों में तथ्य पाए जाते हैं तो वाहन रिकॉर्ड पूरे मामले की महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकते हैं।
BSP अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल
रिकेश सेन ने आरोप लगाया है कि कथित तौर पर लोहा चोरी के मामलों में यदि कोई ट्रांसपोर्टर पकड़ा जाता था तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करने के बजाय कई मामलों में वाहनों को ब्लैकलिस्ट करने जैसी प्रशासनिक कार्रवाई की जाती थी।
उन्होंने तत्कालीन और वर्तमान जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग की है।
सवाल यह है कि यदि किसी व्यक्ति या कंपनी के खिलाफ चोरी से जुड़ा गंभीर संदेह था, तो क्या केवल प्रशासनिक कार्रवाई की गई या आपराधिक जांच भी हुई?
इसका जवाब संबंधित दस्तावेजों और आधिकारिक जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा।
स्क्रैप टेंडर और माल के वजन की जांच की मांग
विधायक ने BSP से बाहर जाने वाले स्क्रैप और अन्य सामग्री की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं।
उन्होंने वर्षों पुराने रिकॉर्ड की जांच की मांग करते हुए पूछा है—
- कितने स्क्रैप टेंडर जारी किए गए?
- किन कंपनियों को ठेके मिले?
- प्लांट से कितनी मात्रा में सामग्री बाहर गई?
- प्रत्येक खेप का वजन कितना दर्ज किया गया?
- गेट पास और सुरक्षा रिकॉर्ड में क्या दर्ज है?
- माल बाहर भेजने की निगरानी किस व्यवस्था के तहत होती थी?
- पूर्व में मिली शिकायतों पर क्या कार्रवाई की गई?
इन रिकॉर्डों की जांच से कथित अनियमितताओं की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
ट्रांसपोर्ट यूनियन पर कथित वसूली का आरोप
विधायक ने अपने फेसबुक पोस्ट में ट्रांसपोर्ट यूनियन द्वारा कथित बड़े पैमाने पर धन वसूली का आरोप भी लगाया है।
उन्होंने सवाल किया कि यदि इस प्रकार की गतिविधियां लंबे समय से चल रही थीं तो पुलिस और प्रशासन ने स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लिया।
विधायक ने कथित वसूली से जुड़े धन के स्रोत और उसके उपयोग की जांच की मांग की है।
ऐसे मामलों में बैंकिंग लेन-देन, कंपनी रिकॉर्ड, टैक्स दस्तावेज और अन्य वित्तीय अभिलेखों की जांच से आरोपों की वास्तविकता सामने आ सकती है।
“छोटे आरोपी पकड़े गए, लेकिन असली नेटवर्क तक कौन पहुंचेगा?”
विधायक का सबसे बड़ा सवाल कथित नेटवर्क के मुख्य सूत्रधारों को लेकर है।
उनका कहना है कि यदि कुछ लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई भी है तो यह पता लगाना जरूरी है कि क्या वे वास्तव में पूरे नेटवर्क के मुख्य आरोपी हैं या केवल निचले स्तर पर काम करने वाले लोग।
अब जांच के सामने प्रमुख सवाल हैं—
चोरी का माल कहां से निकलता था?
कौन उसे बाहर ले जाता था?
कौन खरीदता था?
कहां भंडारण होता था?
किसके संरक्षण में कथित नेटवर्क चलता था?
और कथित अवैध कमाई आखिर किस तक पहुंचती थी?
रसमड़ा की फैक्ट्री का भी किया उल्लेख
विधायक ने अपने पोस्ट में रसमड़ा क्षेत्र स्थित एक फैक्ट्री का उल्लेख करते हुए दावा किया है कि वहां BSP से कथित चोरी का लोहा पहुंचने की चर्चा होती रही है।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि ऐसी शिकायतें या सूचनाएं जांच एजेंसियों के सामने थीं तो संबंधित प्रतिष्ठानों की जांच क्यों नहीं की गई?
हालांकि, किसी फैक्ट्री, संस्था या व्यक्ति की कथित संलिप्तता केवल आरोप या चर्चा से साबित नहीं होती। इसकी पुष्टि दस्तावेजी साक्ष्य और कानूनी जांच से ही हो सकती है।
DGP अरुण देव गौतम से व्यक्तिगत हस्तक्षेप की मांग
रिकेश सेन ने DGP अरुण देव गौतम से इस मामले में व्यक्तिगत रूप से संज्ञान लेने की अपील की है।
उन्होंने उम्मीद जताई है कि राष्ट्रीय संपत्ति से जुड़े इस कथित मामले की जांच बिना किसी राजनीतिक या प्रभावशाली दबाव के निष्पक्ष तरीके से होगी और जांच केवल छोटे आरोपियों तक सीमित नहीं रहेगी।
अब जांच एजेंसियों के सामने कई बड़े सवाल
भिलाई स्टील प्लांट देश की महत्वपूर्ण औद्योगिक संपत्तियों में शामिल है। ऐसे में उससे जुड़े कथित लोहा चोरी, स्क्रैप, परिवहन और वित्तीय नेटवर्क के आरोप गंभीर हैं।
यदि विधायक द्वारा लगाए गए आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो मामला सामान्य चोरी से कहीं बड़ा होकर राष्ट्रीय संपत्ति को कथित रूप से लंबे समय तक नुकसान पहुंचाने वाले संगठित आर्थिक अपराध का रूप ले सकता है।
वहीं, यदि आरोपों में तथ्य नहीं हैं तो निष्पक्ष जांच के जरिए स्थिति स्पष्ट करना भी उतना ही जरूरी है।
जनता जानना चाहती है—क्या 40 साल पुराने रिकॉर्ड खंगाले जाएंगे?
क्या काटे जा चुके 100 से अधिक वाहनों का इतिहास निकाला जाएगा?
क्या ट्रांसपोर्टरों की भूमिका की जांच होगी?
क्या कथित वित्तीय लेन-देन की पड़ताल होगी?
क्या BSP की सुरक्षा और अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या जांच कथित मास्टरमाइंड तक पहुंचेगी?
विधायक रिकेश सेन के खुले पत्र ने भिलाई स्टील प्लांट से कथित लोहा चोरी के पुराने मामले को एक बार फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। अब नजर पुलिस मुख्यालय और संबंधित जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई पर है।
जनता का सवाल “राष्ट्रीय संपत्ति की कथित चोरी का आरोप 40 साल पुराना है, तो क्या जांच भी केवल कागजों तक सीमित रहेगी?”
सच सामने आना चाहिए—लेकिन फैसला आरोपों से नहीं, निष्पक्ष जांच और ठोस सबूतों से होना चाहिए।

















